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न्यायालयों में न्यायधीशों  भारी कमी के मायने

संदर्भः- केंद्रीय विधि मंत्रालय का आंकड़ा, 6000 से ज्यादा न्यायधीशों  की कमी

-प्रमोद भार्गव-

हमारे यहां संख्या के आदर्ष अनुपात में कर्मचारियों की कमी बनी ही रहती है। ऐसा केवल न्यायालयों में हो, ऐसा नहीं है, पुलिस, षिक्षा और स्वास्थ्य विभागों में भी गुणवत्तापूर्ण सेवाएं उपलब्ध न कराने का यही बहाना है। संसद में इसी साल चर्चा के लिए तैयार किए गए दस्तावेजों के अनुसार प्रति 10 लाख की आबादी पर 19.49 जज हैं। निचली अदालतों में 5,748, उच्च न्यायालयों में 406 और सर्वोच्च न्यायालय में 6 जजों के पद रिक्त हैं। जजों के कुल स्वीकृत 22,474 पदों में से निचली अदालतों में 16,726 जज सेवारत हैं। इसी प्रकार उच्च न्यायालयों में मंजूर 1,079 पदों की तुलना में 673 जज ही कार्यरत हैं। सर्वोच्च न्यायालय में कुल 31 पद स्वीकृत हैं, जिनमें से 6 खाली हैं। गोया, न्यायपालिका में कुल 6,160 जजों के पद खाली हैं। जजों की कमी का मामला अप्रैल 2016 में उस समय सुर्खियों में आया था, जब तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश  टीएस ठाकुर ने जजों की नियुक्ति में सरकार की निश्क्रियता का रोना रोते हुए मुकदमों के अंबार से निपटने के लिए जजों की संख्या 21,000 से बढ़ाकर 40,000 करने की बात कही थी। लेकिन तब से लेकर अब तक स्थिति यथावत है। वर्तमान में सभी अदालतों में कुल मिलाकर 2,76,74,499 मामले लंबित हैं। यह स्थिति तब है जब अदालतों का संस्थागत ढांचा भी बढ़ा दिया गया है। उपभोक्ता, परिवार और किषोर न्यायालय अलग से अस्तित्व में आ गए हैं। फिर भी काम संतोशजनक नहीं हैं। उपभोक्ता अदालतें अपनी कार्य संस्कृति के चलते अब बोझ साबित होने लगी हैं। बावजूद औद्योगिक घरानों के वादियों के लिए पृथक से वाणिज्य न्यायालय बनाने की पैरवी की जा रही है ? जिस तरह से नाबालिग बच्चियों से दुश्कर्म और हत्याओं के मामलों की सुनवाई में तेजी लाकर फैसले डेढ़ से तीन माह के भीतर सुनाए गए हैं, उसी तरह जज अन्य प्रकृति के मामलों में भी तेजी से सुनवाई करें तो निर्णय षीघ्र आएंगे और लंबित मामले तेजी से कम होते चले जाएंगे।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

अलबत्ता आज भी ब्रिटिश  परंपरा के अनुसार अनेक न्यायाधीष ग्रीश्म ऋतु में छुट्टियों पर चले जाते हैं। सरकारी नौकरियों में जब से महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान हुआ है, तब से हरेक विभाग में महिलाकर्मियों की संख्या बढ़ी है। इन महिलाओं को 26 माह के प्रसूति अवकाष के साथ दो बच्चों की 18 साल की उम्र तक के लिए दो वर्श का ‘बाल सुरक्षा अवकाष‘ भी दिया जाता है। अदालत से लेकर अन्य सरकारी विभागों में मामलों के लंबित होने में ये अवकाष एक बड़ा कारण बन रहे हैं। इधर कुछ समय से लोगों के मन में यह भ्रम भी पैठ कर गया है कि न्यायपालिका से डंडा चलवाकर विधायिका और कार्यपालिका से छोटे से छोटा काम भी कराया जा सकता है। इस कारण न्यायलयों में जनहित याचिकाएं बढ़ रही हैं,जो न्यायालय के बुनियादी कामों को प्रभावित कर रही हैं। जबकि प्रदूशण, यातायात, पर्यावरण और पानी जैसे मुद्दों पर अदालत की दखल के बावजूद इन क्षेत्रों में बेहतर स्थिति नहीं बनी है।
न्यायिक सिद्धांत का तकाजा है कि एक तो सजा मिलने से पहले किसी को अपराधी न माना जाए,दूसरे आरोप का सामना कर रहे व्यक्ति का फैसला एक तय समय-सीमा में हो जाए। लेकिन दुर्भाग्य से हमारे यहां ऐसा संभव नहीं होता। इसकी एक वजह न्यायालय और न्यायाधीषों की कमी जरूर है,लेकिन यह आंषिक सत्य है, पूर्ण सत्य नहीं। मुकदमों को लंबा खिंचने की एक वजह अदालतों की कार्य-संस्कृति भी है। सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत न्यायमूर्ति राजेंद्रमल लोढ़ा ने कहा भी था ‘न्यायाधीष भले ही निर्धारित दिन ही काम करें, लेकिन यदि वे कभी छुट्टी पर जाएं तो पूर्व सूचना अवष्य दें। ताकि उनकी जगह वैकल्पिक व्यवस्था की जा सके।‘ इस तथ्य से यह बात सिद्ध होती है कि सभी अदालतों के न्यायाधीष बिना किसी पूर्व सूचना के आकस्मिक अवकाष पर चले जाते हैं। गोया, मामले की तारीख आगे बढ़ानी पड़ती है। इन्हीं न्यायमूर्ति ने कहा था कि ‘जब अस्पताल 365 दिन चल सकते हैं तो अदालतें क्यों नहीं ?‘ यह बेहद सटीक सवाल था। हमारे यहां अस्पताल ही नहीं,राजस्व और पुलिस विभाग के लोग भी लगभग 365 दिन ही काम करते हैं। किसी आपदा के समय इनका काम और बढ़ जाता है। इनके कामों में विधायिका और खबरपालिका के साथ समाज का दबाव भी रहता है। बावजूद ये लोग दिन-रात कानून के पालन के प्रति सजग रहते हैं। जबकि अदालतों पर कोई अप्रत्यक्ष दबाव नहीं होता है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

यही प्रकृति वकीलों में भी देखने में आती है। हालांकि वकील अपने कनिश्ठ वकील से अकसर इस कमी की वैकल्पिक पूर्ती कर लेते हैं। लेकिन वकील जब प्रकरण का ठीक से अध्ययन नहीं कर पाते अथवा मामले को मजबूती देने के लिए किसी दस्तावेजी साक्ष्य को तलाष रहे होते हैं तो वे बिना किसी ठोस कारण के तारीख आगे खिसकाने की अर्जी लगा देते हैं। विडंबना है कि बिना कोई ठोस पड़ताल किए न्यायाधीष इसे स्वीकार भी कर लेते हैं। तारीख बढ़ने का आधार बेवजह की हड़तालें और न्यायाधीषों व अधिवक्ताओं के परिजनों की मौंते भी हैं। ऐसे में श्रद्वांजली सभा कर अदालतें कामकाज को स्थगित कर देती हैं। न्यायमूर्ति लोढ़ा ने इस तरह के स्थगन और हड़तालों से बचने की सलाह दी थी। लेकिन जिनका स्वार्थ मुकदमों को लंबा चलाने में अंतर्निहित है,वहां ऐसी नसीहतों की परवाह किसे है ? लिहाजा कड़ाई बरतते हुए कठोर नियम-कायदे बनाने का अधिकतम अंतराल 15 दिन से ज्यादा का न हो, दूसरे अगर किसी मामले का निराकरण समय-सीमा में नहीं हो पा रहा है तो ऐसे मामलों को विषेश प्रकरण की श्रेणी में लाकर उसका निराकरण त्वरित और लगातार सुनवाई की प्रक्रिया के अंतर्गत हो। ऐसा होता है, तो मामलों को निपटाने में तेजी आ सकती है।

 

 

 

 

 

 

 

 

कई मामलों में गवाहों की अधिक संख्या भी मामले को लंबा खींचने का काम करती है। ग्रामीण परिवेष और बलवों से जुड़े मामलों में ऐसा अक्सर देखने में आता है। इस तरह के एक ही मामले में गवाहों की संख्या 50 तक देखी गई है, जबकि घटना के सत्यापन के लिए दो-तीन गवाह पर्याप्त होते हैं। इतने गवाहों के बयानों में विरोधाभास होना संभव है। इसका लाभ फरियादी की बजाय अपराधी को मिलता है। इसी तरह चिकित्सा परीक्षण से संबंधित चिकित्सक को अदालत में साक्ष्य के रूप में उपस्थित होने से छूट दी जाए। क्योंकि चिकित्सक गवाही देने से पहले अपनी रिपोर्ट को पढ़ते हैं और फिर उसी इबारत को मुहंजबानी बोलते हैं। लेकिन ज्यादातर चिकित्सक अपनी व्यस्ताओं के चलते पहली तारीख को अदालत में हाजिर नहीं हो पाते, लिहाजा चिकित्सक को साक्ष्य से मुक्त रखना उचित है। इससे रोगी भी स्वास्थ्य सेवा से वंचित नहीं होंगे और मामला बेवजह लंबित नहीं होगा। एफएसएल रिपोर्ट भी समय पर नहीं आने के कारण मामले को लंबा खींचती हैं। फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगषालाओं की कमी होने के कारण अब तो सामान्य रिपोर्ट आने में भी एक से ड़ेढ़ साल का समय लग जाता है। प्रयोगषालाओं में ईमानदारी नहीं बरतने के कारण संदिग्ध रिपोर्टें भी आ रही हैं। लिहाजा इन रिपोर्टों की क्या वास्तव में जरूरत है, इसकी भी पड़ताल जरूरी है ? क्योंकि एफएसएक की तुलना में डीएनए जांच कहीं ज्यादा विष्वसनीय है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

अदालतों में मुकादमों की संख्या बढ़ाने में राज्य सरकारों का रवैया भी जिम्मेवार है। वेतन विंसगतियों को लेकर एक ही प्रकृति के कई मामले ऊपर की अदालतों में विचाराधीन हैं। इनमें से अनेक तो ऐसे प्रकरण हैं, जिनमें सरकारें आदर्ष व पारदर्षी नियोक्ता की षर्तें पूरी नहीं करतीं हैं। नतीजतन जो वास्तविक हकदार हैं, उन्हें अदालत की षरण में जाना पड़ता है। कई कर्मचारी सेवानिवृति के बाद भी बकाए के भुगतान के लिए अदालतों में जाते हैं। जबकि इन मामलों को कार्यपालिका अपने स्तर पर निपटा सकती है। हालांकि कर्मचारियों से जुड़े मामलों का सीधा संबंध विचाराधीन कैदियों की तादाद बढ़ाने से नहीं है, लेकिन अदालतों में प्रकरणों की संख्या और काम का बोझ बढ़ाने का काम तो ये मामले करते ही हैं। इसी तरह पंचायत पदाधिकारियों और राजस्व मामलों का निराकरण राजस्व न्यायालयों में न होने के कारण न्यायालयों में प्रकरणों की संख्या बढ़ रही है। जीवन बीमा, दुर्घटना बीमा और बिजली बिलों का विभाग स्तर पर नहीं निपटना भी अदालतों पर बोझ बढ़ा रहे हैं। कई प्रांतों के भू-राजस्व कानून विसंगतिपूर्ण हैं। इनमें नाजायज कब्जे को वैध ठहराने के उपाय हैं। जबकि जिस व्यक्ति के पास दस्तावेजी साक्ष्य हैं, वह भटकता रहता है। इन विसंगतिपूर्ण धाराओं का विलोपीकरण करके अवैध कब्जों से संबंधित मामलों से निजात पाई जा सकती है। लेकिन नौकरशाही  कमी के मायने ही ऐसे कानूनों का वजूद बने रहना चाहती है, क्योंकि इनके बने रहने पर ही इनके रौब-रुतबा और पौ-बारह सुनिष्चित हैं। कारागारों में विचाराधीन कैदियों की बड़ी तादाद होने का एक बड़ा कारण न्यायायिक और राजस्व अदालतों में लेटलतीफी और आपराधिक न्याय प्रक्रिया की असफलता को माना जाता है। लेकिन अदालतें इस हकीकत को न्यायालयों और न्यायाधीषों की कमी का आधार मानकर अकसर नकारती हैं। इसलिए अच्छा है जजों की कमी से अलहदा कारणों की पड़ताल करके उन्हें हल करने के उपाय तलाषे जाएं ?

प्रमोद भार्गव
लेखक/पत्रकार
शब्दार्थ 49,श्रीराम काॅलोनी
शिवपुरी म.प्र.
मो. 09425488224,09981061100

लेखक वरिष्ठ साहित्यकार और पत्रकार हैं।

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