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आज डोल ग्यारस है ,जानें क्यों प्रसिद्ध है श्योपुर का यह महोत्सव

श्योपुर का डोल ग्यारस उत्सव – एक समृद्ध परम्परा
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श्योपुर का डोल ग्यारस उत्सव ग्वालियर चम्बल संभाग में ही नही मप्र में भी विख्यात है । समय के साथ यह परम्परा समृद्ध और विस्तृत होती जा रही है।
यूँ तो डोल ग्यारस देश भर में अलग अलग नामों मनाई जाती है। इस दिन भगवान विष्णु के वामन अवतार एवं भगवान कृष्ण के बाल रूप में पूजा की जाती है। कहा जाता है कि देवशयनी एकादशी पर योगनिद्रा में गये विष्णु इस दिन करवट लेते है इस कारण इसे परिवर्तनी एकादशी कहा जाता है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

वामन भगवान की पूजा होने के कारण यह वामन एकादशी कहलाती है। इसी दिन माता यशोदा ने जलवा पूजन कराकर भगवान कृष्ण के वस्त्र धोए थे तथा नए वस्त्र पहना कर सूरज के दर्शन कराए थे तथा पालना रस्म हुई थी। इस कारण इसे जलझूलनी एकादशी भी कहा जाता है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

श्योपुर में डोल ग्यारस उत्सव कब आरम्भ हुआ? इस सम्बन्ध में कोई अभिलेखीय साक्ष्य उपलब्ध नही है। श्योपुर के अधिकांश गौड़ राजा भगवान कृष्ण के अनुयायी रहे है यह परम्परा उन्ही के द्वारा आरम्भ की गई बाद में सिंधिया राजवंश ने भी इस परम्परा को अक्षुण्य रखा। इस प्रकार श्योपुर का डोल ग्यारस उत्सव 200 वर्ष से अधिक अवधि पूर्ण कर चुका है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

श्योपुर में डोल ग्यारस एक जनउत्सव का रूप ले चुका है।इस दिन नगर और गाँव के मंदिरों से भगवान विहार के लिए डोल में बैठा कर ले जाये जाते है।मंदिरों के अलावा सभी समाज भी अपने अपने डोल में पूर्ण श्रद्धा भाव से सज़ाबट के साथ भगवान को जलविहार के लिए ले जाते है।
बंजारा डेम पर पर भगवान को स्नान कराया जाता है फिर वही आरती होती है सांझ ढलते समय सीप नदी के किनारे हजारों लोगों की भीड़ में यह आरती का दृश्य अद्भुत सात्विक माहौल पैदा करता है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

आरती के पश्चात सभी डोल रामद्वारा के समीप विश्राम करते हैं जहाँ भारी जन समुदाय उनके दर्शन लाभ प्राप्त करता है। अपने स्थान को प्रस्थान करने के पूर्व सभी डोलो मे विराजमान विग्रहों की तोड़ी गणेश मंदिर पर आरती होती है ।इसके बाद सभी डोल अपने अपने स्थान के लिए प्रस्थान कर जाते हैं।
डोल ग्यारस जन जन का उत्सव है । यहाँ 45 डोल निकलते है। इस दौरान नगर और गाँव मे उत्साह देखते बनता है । सम्पूर्ण क्षेत्र के लोग ऐसा लगता है जैसे सड़को पर उतर आए हो।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

आज जब कतिपय त्यौहार उन्माद और विरोधी भाव पैदा कर है इसके विपरीत डोल ग्यारस उत्सव जन जन को जोड़ने का काम करता है। इस अवसर पर श्योपुर के बैंडो में भी प्रतियोगिता सी होती लगती है।

 

 

 

 

 

 

ये बैंड श्री राम ,श्री कृष्ण , श्याम जैसे नामो से होते है , पर इनके मास्टर मो इरशाद , मो इरफान , मो अनीश जैसे लोग होते है , जो इस अवसर पर अपनी प्रस्तुति में बेहतर से बेहतर प्रदर्शन करते हुए सब कुछ देने को तत्पर होते है।
इस प्रकार श्योपुर का डोल ग्यारस उत्सव जन आस्था का उत्सव बन गया है जो लोगो को जोड़ने का काम करता है।

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